Tuesday, 21 October 2014

दो पल का कारवाँ था...

कभी दूर जाते-जाते
मुझे पास का गुमाँ है
मेरा दर्द मुझको भाये
क्योंकि ये तेरा ही निशाँ है |

सोचा था साहिलों पे
मेरा नाम अब भी होगा
जहाँ से शुरू हुआ था
वहाँ कुछ निशाँ तो होगा |

जो रास्ता चुना है
वहां मंजिलें नहीं हैं
बस कुछ निशाँ हैं ऐसे
जो कुछ दूर ही चले हैं |

अब सोचता हूँ ये की
क्या अब भी वो गुल खिले हैं
क्या चाँद है वहां पे
जहाँ तुम कभी मिले थे |

क्या अब भी तुमको वैसे
मेरा इंतज़ार होगा
क्या अब भी मेरे लिए ही
केवल श्रृंगार होगा |

कुछ याद करते –करते
क्या आइना भी देखती हो  
और बारिशों से बच कर
कुछ देर सोचती हो |

कोई प्यार मेरा अब भी
सूने में छेड़ता है
रातों में नैन खुलकर
मेरी ओर देखता है |

संग बादलों के चलते
मुझे छाया का गुमाँ था
पर भींग कर ये जाना

दो पल का कारवाँ था | 

Monday, 20 October 2014

अक्ल और इश्क़...

आज सोचा अक्ल से कुछ काम कर लूं
और फिर जाकर मैंने इश्क कर लिया |

Sunday, 19 October 2014

जी चाहता है ...

किसी दर्द पर फिर
ऐतवार करने को जी चाहता है
बारिशों से मिलकर फिर
एक बार रोने को जी चाहता है
क्या करें आखिर
प्यार का दर्द भी तो
हर किसी के नसीब में नहीं होता
इसीलिए तो दीवारों के इस शहर में
फिर से घर बनाने को जी चाहता है |

वक़्त तो लगेगा...

एहसास को लफ्ज़ बनने में कुछ वक़्त तो लगेगा 
धड़कनों को आवाज़ बनने में कुछ वक़्त तो लगेगा 
उसने तो सब बातें आँखों से ही कह दी 
हमें समझने में थोड़ा वक़्त तो लगेगा |

Friday, 17 October 2014

कोई मिल गया है...

धूपों की बारिशों में 
एक बूँद मिल गई है
एक ख्वाब मिल गया है
एक चाह मिल गई है |

है बेखबर तमन्ना 
ख्वाबों को न पता है 
की धूपों के रास्ते में 
इक छाँव मिल गया है |
Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution 3.0 Unported License.