किसी दर्द पर फिर
ऐतवार करने को जी चाहता है
बारिशों से मिलकर फिर
एक बार रोने को जी चाहता है
क्या करें आखिर
प्यार का दर्द भी तो
हर किसी के नसीब में नहीं होता
इसीलिए तो दीवारों के इस शहर में
फिर से घर बनाने को जी चाहता है |
ऐतवार करने को जी चाहता है
बारिशों से मिलकर फिर
एक बार रोने को जी चाहता है
क्या करें आखिर
प्यार का दर्द भी तो
हर किसी के नसीब में नहीं होता
इसीलिए तो दीवारों के इस शहर में
फिर से घर बनाने को जी चाहता है |
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