कुछ सांसें जब होठों को सहलाते हुए गुजरे थे तो जिन्दा होने का एहसास दे गए थे | हथेलिओं को थोड़ी गर्मी का एहसास हुआ और दिल के किसी कोने में जमे हुए जज्बात का कोई टुकड़ा शायद पिघल गया |
कभी कभी हम वक़्त से कुछ ज्यादा ही मांग लेते हैं ,शायद अपनी हैसियत से बहुत अधिक ,इसीलिए तो खाली हथेलियों में कुछ उलझी लकीरें ही रह जाती हैं बस , और दिमाग में उलझे से कुछ सवाल | वक़्त मेरी ख्वाहिशों को अंजाम नहीं दे सका मुझे इस बात की शिकायत तो नहीं है पर जो उसने दे दिया वो हमसे वापस ले तो लेता,वो यादों की परछाई ,वो साँसों में बसी उसकी खुशबू ,होठों पे दर्ज की गयी उसकी शिकायत , दिमाग के हर जर्रे में जज्ब किया गया उसका वो अक्स ..........|