Monday, 17 December 2012

धुंधली तस्वीर


आइने को देखने से तस्वीरें 
बदला तो नहीं करती 
फिर भी 
मैं हर रोज 
आईने में खुद के अक्स को खोजता हूँ 
और सोचता हूँ 
शायद इस आईने में तस्वीरें  
ठीक से उभरा नहीं करती 
सो मैंने 
एक रोज 
आईने को ही बदल डाला 
और फिर से अगली सुबह 
खुद को तराशने की कोशिश की 
पर खुद को फिर से एक बार 
मैंने नावाकिफ सा ही पाया 
सो अब सोचता हूँ 
शायद यहाँ की हवाओं में ही  
कुछ नमी सी है 
इसीलिए तो 
हर रोज आईने में  
 अक्स की आँखों में 
ओस की बूंदों की तरह 
तैरता सा पानी का एक कतरा 
नज़र आ ही जाता है 
और मेरी तस्वीर 
धुंधली सी पर जाती है |

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