आइने को देखने से तस्वीरें
बदला तो नहीं करती
फिर भी
मैं हर रोज
आईने में खुद के अक्स को खोजता हूँ
और सोचता हूँ
शायद इस आईने में तस्वीरें
ठीक से उभरा नहीं करती
सो मैंने
एक रोज
आईने को ही बदल डाला
और फिर से अगली सुबह
खुद को तराशने की कोशिश की
पर खुद को फिर से एक बार
मैंने नावाकिफ सा ही पाया
सो अब सोचता हूँ
शायद यहाँ की हवाओं में ही
कुछ नमी सी है
इसीलिए तो
हर रोज आईने में
अक्स की आँखों में
ओस की बूंदों की तरह
तैरता सा पानी का एक कतरा
नज़र आ ही जाता है
और मेरी तस्वीर
धुंधली सी पर जाती है |
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