रातों को तेरी आँखों में सहर होते हुए देखा है
लफ़्ज़ों को तेरे होठों पे ग़ज़ल होते हुए देखा है
उलझ तो गयी थी साँसें तेरी ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म में लेकिन
मैंने कितने ही ख्वाहिशों को तेरी क़दमों में दफ़न होते हुए देखा है |
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