Monday, 2 March 2020

चाहता हूँ

आज फिर मैं ख्वाब देखने  की खुद से इज़ाज़त चाहता हूँ,
 इन रुके जज्बात को फिर से अल्फ़ाज़ देना चाहता हूँ ।
 मेरे आँखों में शाम रुकी है तो रूकी ही सही,
 लेकिन एक बार फिर से किसी आँखों में सहर होकर बिखर जाना चाहता हूँ । 
मेरे हाथ की लकीरें अधूरी हैं तो अधूरी ही सही,
लेकिन किसी के हाथ की लकीरों को इनसे मिलाकर उसे मुकम्मल बनाना चाहता हूँ ।
मेरे आँखों के ख्वाब रूठे हैं तो रूठे ही सही,
लेकिन किसी के खूबसूरत आँखों का ख्वाब बनकर जी लेना चाहता हूँ ।
डर है  किसी की रुसवाइयों का तो रूसवाइयाँ ही सही,
लेकिन एक बार फिर  से किसी की सांस बन कर उसी के सीने मे बिखर जाना चाहता हूँ।

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