Sunday, 26 April 2020

बस,

हम मान चुके सब कुछ तुमको,
हम हार चुके सब कुछ तुमको ।
बस,
कुछ रस्मों की दीवारें हैं,
कुछ वक़्त से भी हम हारे हैं ।

Friday, 17 April 2020

है कोई ।

कुछ पत्थरों को शहर से उठा ले गया है कोई
शहर में फिर से हाथों में हाथ दिखने लगा है ।

शाम ढलने से पहले दिया जला गया है कोई
शायद कोई इस सूने घर में फिर से रहने लगा है ।

सफ़ेद साड़ी पे फिर से हल्दी चढ़ा गया है कोई
शायद फिर से दिल में उम्मीद जागने लगी है ।

की कहीं तुम

ये वक़्त गर,
थम जाए तो, देखूँ तुझे,
खो जाए तो, सोचूँ तुझे,
मिल जाए तो, पूछूँ कभी,
की कहीं तुम मेरे सीने से बिछड़ी हुई कोई साँस तो नहीं...


ये नींद गर,
खुल जाए तो, तेरा बनूँ,
आ जाए तो, ख्वाबें बुनू,
उड़ जाए तो, सोचूँ कभी, 
की कहीं तुम बस कोई एक खूबसूरत ख्वाब तो नहीं...
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