यही बस चाहता हूँ मैं
कि मैं तुझमे बिखर जाऊं
कोई न छू सके मुझको
कोई न छीन ले तुझसे
बस तेरे आंसूं में मैं निकलूं
तेरे आहों में बस जाऊं ।
यही बस चाहता हूँ मैं
की मैं अब रात बन जाऊं
कोई न देख ले मुझको
कोई न पूछ ले मुझसे
बस तेरे दामन का हूँ मैं दाग
मैं अपने खूं से ही धुल जाऊं ।
कि मैं तुझमे बिखर जाऊं
कोई न छू सके मुझको
कोई न छीन ले तुझसे
बस तेरे आंसूं में मैं निकलूं
तेरे आहों में बस जाऊं ।
यही बस चाहता हूँ मैं
की मैं अब रात बन जाऊं
कोई न देख ले मुझको
कोई न पूछ ले मुझसे
बस तेरे दामन का हूँ मैं दाग
मैं अपने खूं से ही धुल जाऊं ।
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