Friday, 19 June 2020

तेरे अंदर


तेरे  अंदर आग लगी थी 
दिल में तो भूचाल मचा था
कुछ तो हमको भी समझाते 
अपना कुछ तो हमे सुनाते | 

काश तुम्हे समझा पाते हम 
उस वक़्त गले लगा पाते हम
तो फिर तुम यूँ दूर ना जाते 
कुछ वक़्त जरा सा तुम रुक जाते | 

कहीं घर का कोना तोड़ गए हो
कितना खाली घर छोड़ गए हो 
इस खाली घर का, क्या करना है 
टूटे कोने को, क्या भरना है 
इतना तो बतला कर जाते
कुछ तो तुम समझा कर जाते  | 


सुशांत सिंह राजपूत

Friday, 12 June 2020

जरा तुम

कभी बादल जो न बरसे
जरा तुम रूठ फिर जाना
मैं कितना भी मनाऊं तो
मगर तुम मान मत जाना ,
बहुत सारे जो हैं शिकवे
इसे तुम भूल मत जाना ,
एक शिकवा एक दिन का हो
और दिन भर मैं मनाऊंगा,
और सिलसला ये उम्र भर का हो
बस कभी कभी मान भी जाना |

कभी मैं न भी बुलाऊँ तो
यूँ ही तुम मिलने आ जाना,
भले कितने भी हो शिकवे
उसे तुम भूल कर आना,
कभी गर रूठ जाऊं तो
जरा तुम भी मना लेना,
बस मेरे गोदी में सर रख के
जरा सी  देर सो लेना,
भले हो दूरियां कितनी
भाई कह के मिटा देना |
 

ज़िंदगी की भाग-दौड़ में जब भी मुझे खुद पर से भरोसा उठा, हर उस वक़्त में मुझ पर  भरोसा करने के लिए हर जन्म में तुम मेरे घर को अपना बनाने आज के ही दिन आ जाना |  हाँ ! आ जाना, लेकिन मेरे बाद |  तुम मेरे ज़िंदगी का सबसे अनमोल तोहफा हो जो आज के दिन ऊपर वाले ने मुझे दिया था | जन्मदिन मुबारक हो मेरी प्यारी सी गुड़िया | मेरी हर ख़ुशी तुम्हे मिल जाए | 

बहुत सी मंजिलें हैं जो, तुम्हे अभी और पानी है

बहुत पामाल रस्तों से, यहाँ तक काफिला पहुंचा
बहुत सी ख्वाहिशों का, यहाँ अरमान है निकला
बहुत सी मंजिलें हैं जो, तुम्हे अभी और पानी है
बड़ी सी ज़िंदगी है जो, तुम्हे अभी और जीनी है
बहुत से भाग्य थे जागे, तुम्हारे एक होने से
बहुत से ख्वाब हैं जागे, तुम्हारे एक आने से।

Monday, 1 June 2020

फिर से


धीमे धीमे ये रात कटी है
मेरी आँख तुम्हारी चौखट पे थी
और ध्यान तुम्हारी आहट पे थी
कुछ याद तुम्हारे बिस्तर पे थी
कोई बात हमारे जेहन में थी
किन-किन बातों को समझाते हम
हर बातों पर बात रुकी थी
कुछ बातों में रंज था तेरा
कुछ बातों में दर्द रुका था
पर हर बातें इस पर रुक जाती
की पेड़ों पर कोपल फूटे थे
बारिश में तन मन भींगे थे
पर कल की तेज हवाओं में
कुछ कोपल भी टूट गए हैं
एक नया नीड़ भी था उस पर
वो भी डाली से छूट गया है 
ये कुछ और नहीं बस वक़्त बुरा है
फिर से पंछी आयेंगे ही
फिर से कोपल भी फूटेगा
फिर से नव नीर बनायेंगे
और तेज हवा छू आयेंगे। 
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