Monday, 1 June 2020

फिर से


धीमे धीमे ये रात कटी है
मेरी आँख तुम्हारी चौखट पे थी
और ध्यान तुम्हारी आहट पे थी
कुछ याद तुम्हारे बिस्तर पे थी
कोई बात हमारे जेहन में थी
किन-किन बातों को समझाते हम
हर बातों पर बात रुकी थी
कुछ बातों में रंज था तेरा
कुछ बातों में दर्द रुका था
पर हर बातें इस पर रुक जाती
की पेड़ों पर कोपल फूटे थे
बारिश में तन मन भींगे थे
पर कल की तेज हवाओं में
कुछ कोपल भी टूट गए हैं
एक नया नीड़ भी था उस पर
वो भी डाली से छूट गया है 
ये कुछ और नहीं बस वक़्त बुरा है
फिर से पंछी आयेंगे ही
फिर से कोपल भी फूटेगा
फिर से नव नीर बनायेंगे
और तेज हवा छू आयेंगे। 

No comments:

Post a Comment

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution 3.0 Unported License.