धीमे धीमे ये रात कटी है
मेरी आँख तुम्हारी चौखट पे थी
और ध्यान तुम्हारी आहट पे थी
कुछ याद तुम्हारे बिस्तर पे थी
कोई बात हमारे जेहन में थी
किन-किन बातों को समझाते हम
हर बातों पर बात रुकी थी
कुछ बातों में रंज था तेरा
कुछ बातों में दर्द रुका था
पर हर बातें इस पर रुक जाती
की पेड़ों पर कोपल फूटे थे
बारिश में तन मन भींगे थे
पर कल की तेज हवाओं में
कुछ कोपल भी टूट गए हैं
एक नया नीड़ भी था उस पर
वो भी डाली से छूट गया है
ये कुछ और नहीं बस वक़्त बुरा है
फिर से पंछी आयेंगे ही
फिर से कोपल भी फूटेगा
फिर से नव नीर बनायेंगे
और तेज हवा छू आयेंगे।
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