बहुत दिनों से चाँद को देखा ही नहीं
पता नहीं
वो अब भी मेरे घर के पिछवाड़े में
निकलता भी है या नहीं
पहले तो कभी कभी चांदनी रात में
चुपके से उसकी रौशनी में
खुद को खोजने की कोशिश किया करता था
पर अब तो वो भी मयस्सर नहीं होता
अब तो वो अक्सर मेरे आँगन के पास से
बादलों में छिपकर
यूँ ही निकल जाया करता है
या शायद
उसे देखने की चाहत हो
पर बादल ही उसे
अपनी आगोश में छुपा लेता हो
जो भी हो पर
बहुत दिनों से चाँद को देखा ही नहीं |
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