आखिरी सांझ को अलविदा कहने की बहुत जल्दी है ,शायद इसीलिए की दरकते हुए गुजरे दिन को जल्द से जल्द किसी कोने में छिपा लेने को जी चाहता है जिसे कोई और देख न सके ......वैसे भी खुले हुए जख्म उन हादसों की याद ताज़ा कर देते हैं जो कहीं जेहन मैं पैबस्त हुए बैठे हैं | खिडकियों से आती धीमी धीमी रौशनी अपनी चादर को समेट रही है और अँधेरा अपनी आगोश मैं कई अनछुए अनकहे सवाल छुपाने की पुरजोर कोशिश में लग गया है |
कुछ सवाल शायद इस गुजरते साल के साथ ख़त्म नहीं होंगे ,उन्हें अपने जवाब ढूँढने नए साल में आना होगा |
ये अलग बात है कि इन सवालों को पैदा होने में कई साँसों को अपना वजूद खोना पड़ा , कई लफ्ज़ खामोश हो गए |
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