आँखों में ठहर जाए पानी
तो दर्द बयाँ हो जाता है ,
होठों से निकल जाए बातें
तो इंसान बयाँ हो जाता है |
Wednesday, 9 April 2014
कद्रदान
मैं बज़्म में बैठा रहा
तो अनजान थे सब लोग
मैं हर दफा कहता रहा
तो परेशान थे सब लोग
बस नाम थोड़ा क्या हुआ
कद्रदान थे सब लोग |
हर मोड़
कभी कभी आँखों में तेरे
मेरा ख्वाब दिख जाता है ,
कभी कभी होठों पे तेरे
मेरी बात आ जाती है ,
जब भी चाहता हूँ दर से तेरी
अपनी राहों को मोड़ लूं
हर मोड़ पे वो तेरी
पहली मुलाक़ात नज़र आ जाती है |
कोई तो होगा....
ऐसा क्यों होता है ...हर बार ऐसा क्यों होता है कि कहने के लिए तो हम अकेले ही जहाँ से रूबरू होते हैं और अकेले ही यहाँ से रुखसत हो जाते हैं ...फिर भी सारी उम्र इस इंतज़ार में निकल जाता है की कोई तो होगा जो मेरी इस वीराने में आ कर के कहे की वक़्त के हर उस संगीत में जहाँ तुम्हे बोलने को अल्फाज़ नहीं रहेंगे वहां तुम्हारे लिए मैं गुनगुनाऊंगी ...जब रास्तों पे बस तुम्हारे ही क़दमों के निशाँ होंगे उस वक़्त भी बिन आवाज़ मेरे क़दमों के निशाँ भी तेरे आस पास ही होंगें |
कैनवास
तुम्हारे कैनवास पर लिखना मेरा काम तो नहीं है लेकिन मैं अपने कैनवास में तुम्हे चित्रकारी का मौका कैसे दे दूं, वो तो मेरी थाती है उस कैनवास पर अगर रंग चढ़ेंगे तो भी वो मेरे ही होंगे और कोई लकीर उभरेगी भी तो मेरे ही ख्यालों से उभरेगी ..ये अलग बात है की मैं आज तक उसी रंग को तलाश रहा हूँ जैसा रंग तुम्हारे ख्यालों के साथ साथ तुम्हारे चेहरे पर उभरते थे ..वहां वैसे भी मैंने तुम्हारी ही तस्वीर बना राखी है | लेकिन उस तस्वीर के रंग बस तुम्हारे शक्ल से मेल नहीं खाते हैं , तुम्हारा रंग शायाद गेंहुआ था नहीं नहीं शायाद थोरा गोरा था या शायाद सुर्ख लाल ..कुछ कहना मुश्किल है क्योंकि हर वक़्त तुम्हारे चेहरे के रंग एक जैसे नहीं रह पाते थे ..मुझे आज भी याद है जब पहली बार तुमने मेरे साथ बारिश को महसूस क्या था और मैंने अनजाने में तुम्हारे हाथों को छू लिया था तो तुम्हारा रंग एकदम गुलाबी हो गया था |
मुझे वो भी याद है जब आखरी विदा ले रही थी तो उस बारिश में तुम्हारे चेहरे के सारे रंग एक एक कर किस तरह से धुल रहे थे यूँ लग रहा था जैसे अब किसी रंग की जरूरत ही नहीं रही |
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