तुम्हारे कैनवास पर लिखना मेरा काम तो नहीं है लेकिन मैं अपने कैनवास में तुम्हे चित्रकारी का मौका कैसे दे दूं, वो तो मेरी थाती है उस कैनवास पर अगर रंग चढ़ेंगे तो भी वो मेरे ही होंगे और कोई लकीर उभरेगी भी तो मेरे ही ख्यालों से उभरेगी ..ये अलग बात है की मैं आज तक उसी रंग को तलाश रहा हूँ जैसा रंग तुम्हारे ख्यालों के साथ साथ तुम्हारे चेहरे पर उभरते थे ..वहां वैसे भी मैंने तुम्हारी ही तस्वीर बना राखी है | लेकिन उस तस्वीर के रंग बस तुम्हारे शक्ल से मेल नहीं खाते हैं , तुम्हारा रंग शायाद गेंहुआ था नहीं नहीं शायाद थोरा गोरा था या शायाद सुर्ख लाल ..कुछ कहना मुश्किल है क्योंकि हर वक़्त तुम्हारे चेहरे के रंग एक जैसे नहीं रह पाते थे ..मुझे आज भी याद है जब पहली बार तुमने मेरे साथ बारिश को महसूस क्या था और मैंने अनजाने में तुम्हारे हाथों को छू लिया था तो तुम्हारा रंग एकदम गुलाबी हो गया था |
मुझे वो भी याद है जब आखरी विदा ले रही थी तो उस बारिश में तुम्हारे चेहरे के सारे रंग एक एक कर किस तरह से धुल रहे थे यूँ लग रहा था जैसे अब किसी रंग की जरूरत ही नहीं रही |
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