ऐसा क्यों होता है ...हर बार ऐसा क्यों होता है कि कहने के लिए तो हम अकेले ही जहाँ से रूबरू होते हैं और अकेले ही यहाँ से रुखसत हो जाते हैं ...फिर भी सारी उम्र इस इंतज़ार में निकल जाता है की कोई तो होगा जो मेरी इस वीराने में आ कर के कहे की वक़्त के हर उस संगीत में जहाँ तुम्हे बोलने को अल्फाज़ नहीं रहेंगे वहां तुम्हारे लिए मैं गुनगुनाऊंगी ...जब रास्तों पे बस तुम्हारे ही क़दमों के निशाँ होंगे उस वक़्त भी बिन आवाज़ मेरे क़दमों के निशाँ भी तेरे आस पास ही होंगें |
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