Sunday, 9 November 2014

रश्क न करो यूँ...

रश्क न करो यूँ
तुझसे ही छूटकर हूँ
तुझसे ही टूटकर हूँ
बिखरा हुआ हूँ तुझसे
उलझा हुआ हूँ तुझमे

यूँ छूटने से पहले 
पहचान था तुम्हारी
खुलते हुए लबों की
आवाज़ था तुम्हारी 

रश्क न करो यूँ




Friday, 7 November 2014

बहुत किरदार दुनिया में, निभाऊँ कौन सा साहब....

बहुत किरदार दुनिया में, निभाऊँ कौन सा साहब,
कहो तो बावफ़ा बन जाऊँ, या फिर बेवफा साहब |

अरे इन सर्द साँसों को, यहाँ बस थाम है रखा,
जरा सा पूछ कर कोई, मुझे तो इत्तला कर दो,
इसे मैं जज्ब ही रखूँ, या फिर छोड़ दूँ साहब |

बहुत से दर्द हैं दिल में, छिपाऊँ कौन सा साहब,
कभी लब बोल देते हैं, कभी आंखें मेरी साहब| 

कहो तो मैं तेरे खातिर, कोई किरदार नौ जी लूँ,
मगर इस वास्ते भी तुम, कभी बोला करो साहब |

बहुत किरदार दुनिया में, निभाऊँ कौन सा साहब....

Tuesday, 4 November 2014

अश्क...

“कल अश्क को देखा था मैंने आईने में
किसी ने उकेर कर तेरी तस्वीर बना दी |”

Monday, 3 November 2014

कौन बहायेगा..?

मेरी बर्बादी पे आँसूं अब कौन बहायेगा 
हमने तो खुद से भी चुप रहने का वादा है कर लिया |

Sunday, 2 November 2014

मुमकिन तो नहीं...

हर चीज़ शिद्दत से चाहो
और मिल जाए
ये मुमकिन तो नहीं
आसमाँ के चाँद की ख्वाहिश किसे नहीं होती
मगर ये सबको मिल जाए

ये मुमकिन तो नहीं 

वजूद...

कोई ज़मी तलाश ले
जिसका तुझसे वजूद हो
हर ज़मी तेरी हो

ये ज़रूरी तो नहीं 

सूरत...

मुझको बनाकर आप यूँ ही तोड़ते रहे 
की टूटे भी तो क्या, सूरत तेरी रहे |
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